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Monday, 31 October 2011

किसानों को तकनीकी जानकारी दिलानी ही होगी

देशवासियों का मूल कार्य कृषि है, पर मूल कार्य पर ही सबसे कम ध्यान दिया जा रहा है, तभी कृषि व किसान के साथ देश ही आर्थिक स्थिति में अपेक्षा के अनुरूप सकारात्मक परिणाम नहीं आ पा रहे हैं। हालांकि कृषि क्षेत्र में भी बड़े पैमाने पर परिवर्तन हुए हैं। संसाधनों के साथ सिंचाई आदि की व्यवस्था में लगातार सुधार हो रहे हैं, पर जानकारी के अभाव में किसानों में रसायनों का प्रयोग करने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है या यूं कहें कि रसायन प्रयोग करने की किसानों में धारणा ही बन गयी है, जिससे कई तरह के नुकसान हो रहे हैं और आने वाले समय में और भी घातक दुष्परिणाम सामने आ सकते हैं। 
उदाहरण के रूप में डीएपी खाद की ही बात करें, तो बुआई के दौरान अधिकाँश किसान डीएपी के बगैर बुआई करना पसंद नहीं करते, तभी डीएपी खाद के लिए लाठी खाते हैं या आसानी से न मिलने पर ब्लैक में भी खरीदने को तैयार रहते हैं। बुआई में भले ही देर से हो जाये, पर अधिकाँश किसान डीएपी के बगैर बुआई करने को तैयार नहीं होते, जबकि ऐसा नहीं है कि डीएपी हर खेत के लिए बेहद आवश्यक है या डीएपी के बगैर उपज कम या अधिक आयेगी। जानकरों के साथ वैज्ञानिकों का भी यह मानना है कि  भूमि की उर्वरकता बनाये रखने के लिए देशी खाद से बेहतर और कुछ हो ही नहीं सकता, इसलिए प्रति वर्ष खेत में देशी खाद डालते रहना चाहिए, क्योंकि बारिश के मौसम में गलने के बाद उस देशी खाद का असर दूसरे वर्ष में शुरू होता है और तीसरे वर्ष से पूरा प्रभाव दिखाता है, पर खेत में किसी खास तत्व की कमी जानने के लिए मृदा परीक्षण कराना भी आवश्यक है। मृदा परीक्षण कराने से यह स्पष्ट हो जाता है कि खेत में मूल रूप से किस तत्व की बेहद कमी है और यह जानने के बाद किसान रसायन के रूप में उसी तत्व की भरपाई कर सकते हैं, ऐसा करने से कई तरह के फायदे एक साथ होंगे। सबसे पहला फायदा यही होगा कि रसायन के अनावश्यक प्रयोग करने से भूमि की उर्वरा शक्ति पर विपरीत असर नहीं पड़ेगा। अन्न के मूल गुण कम नहीं होंगे, क्योंकि रसायन के अधिक प्रयोग करने से गुणवत्ता पर विपरीत असर पड़ता है। पर्यावरण पर भी विपरीत असर नहीं पड़ेगा। निरर्थक रसायन न खरीदने के कारण किसान को सीधा आर्थिक लाभ होगा। रसायनों का अधिक या अनावश्यक प्रयोग करने के कारण देश से बड़ी धनराशि विदेश चली जाती है, लेकिन किसान अगर रसायनों का अनावश्यक प्रयोग बंद कर देंगे, तो देश से बाहर जाने वाले धन पर स्वत: ही रोक लग जायेगी और डीएपी खरीदने के लिए होने वाली जददोजहद से भी छुटकारा मिल जायेगा, इसलिए सरकार को व्यापक स्तर पर किसान गोष्ठियों का आयोजन कराना चाहिए। ग्राम प्रधानों की मदद से गांव सभा भी खुली बैठकों में किसानों को विस्तार पूर्वक रसायनों से होने वाली हानि व लाभ के साथ प्रयोग करने की विधि के बारे में जानकारी मुहैया करानी चाहिए, क्योंकि कृषि व्यवस्था सुदृढ़ होने से किसान की स्थिति सुदृढ़ होगी और किसान सुखी होगा, तो बाजार में रौनक होगी, क्योंकि देश का सबसे बड़ा उत्पादक व उपभोक्ता किसान ही है और उसकी जेब में पैसा होगा, तो बाकी सबकी जेब में स्वत: ही पहुंच जायेगा। आंकड़ों की बाजीगरी से कागजों में प्रगति दिखाने की बजाये देश वास्तव में प्रगति करने लगेगा, जो स्पष्ट रूप से दिखाई भी देगा। हालांकि किसानों को जागरुक करने के लिए कई कार्यक्रम व योजनायें इस समय भी चल रही हैं, पर लापरवाही व उदासीनता के चलते किसानों तक जानकारी पहुंच ही नहीं पा रही है, जिससे अपेक्षित परिणाम नहीं आ रहे हैं, इसलिए सरकार को विशेष ध्यान देते हुए किसानों तक जानकारी पहुंचाने की व्यवस्था करनी ही होगी।