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मैं उसका अंश हूँ, बस यही पहचान है मेरी...

Wednesday, 2 November 2011

मुख्यधारा से जुडऩे के लिए आम मुसलमानों को ही आगे आना होगा

मुसलमानों को लेकर सकारात्मक या नकारात्मक चर्चा हमेशा होती ही रहती है। चुनाव के दौरान तो अधिकांश राजनेता मुसलमानों की ही बात करने लगते हैं, पर मुसलमानों की राजनैतिक, आर्थिक या सामाजिक स्थिति पर कोई गंभीरता से विचार करता नजर नहीं आता। आश्चर्य की बात यह भी है कि गैर मुस्लिम राजनेताओं की ही तरह मुस्लिम नेता भी इस ओर गहराई से सोचते या कार्य करते नजर नहीं आते। मुस्लिम या गैर मुस्लिम नेता आम मुसलमानों की भावनाओं का हमेशा ही दुरुपयोग करते नजर आते हैं, तभी मुसलमानों की सामाजिक स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हो पा रहा है, इसीलिए मुसलमानों और गैर मुसलमानों के बीच नफरत की खाई और गहरी होती जा रही है।
आतंकवाद के संदर्भ में बात की जाये, तो हर धमाके के बाद मुसलमानों को ही संदिग्ध नजर से देखा जाता है, पर सवाल यहां यह उठता है कि क्यूं देखा जाता है? इस सवाल पर मुसलमानों को गंभीरता से विचार क्यूं नहीं करना चाहिए? मुलसमान, गैर मुसलमानों से कम देश भक्त नहीं हैं, पर मुसलमान अपनी खराब होती छवि को लेकर चुप्पी क्यूं साधे रहते हैं? इस मुद्दे पर मुस्लिम राजनेताओं या धर्म गुरुओं की बजाये अगर आम मुसलमान ही आगे बढ़ कर सामने आयें, तो देश और समाज हित में बेहद अच्छा रहेगा, क्योंकि राजनेता तटस्थ बात करने की बजाये, राजनीतिक हित-लाभ की बात करते हैं और आम मुसलमान अगर आगे बढ़ कर आयेंगे, तो मुस्लिम राजनेता या धर्म गुरू भी कुछ गलत बोलने से पहले कई बार सोचेंगे।
मुसलमानों को यह सोचना चाहिए कि देश के किसी भी कोने में होने वाले अधिकांश धमाकों के बाद जो नाम प्रकाश में आते हैं, वह संयोग से मुसलमान ही होते हैं और जब ऐसा होता है, तब उन्हें आगे आना चाहिए और ऐसे लोगों का या ऐसी गतिविधियों में शामिल पाये जाने वालों का सामाजिक बहिष्कार करना चाहिए। उनकी खुल कर निंदा करनी चाहिए। सामाजिक रिश्ते पूरी तरह तोड़ देने से भविष्य में कोई भी मुसलमान ऐसी गतिविधियों में शामिल होने से पहले ही काँप उठेगा, पर ऐसा करने की बजाये, मुस्लिम राजनेता उनका समर्थन करते नजर आते हैं या राजनीतिक दल वोट की राजनीति के चलते जांच एजेंसियों व पुलिस पर ही मुस्लिम विरोधी मानसिकता होने का आरोप लगा कर देश विरोधी लोगों का ही मनोबल बढ़ाते नजर आते हैं, जिससे प्रकाश में आये लोगों के साथ बाकी का भी हौसला बढऩा स्वभाविक ही है। ऐसा होने के कारण ही आम मुसलमानों को बहुत बड़ा नुकसान हो रहा है, जिसकी भरपाई तभी संभव है, जब स्वयं मुसलमानों की सोच में परिवर्तन होगा, अन्यथा उनके प्रति गैर मुस्लिमों की सोच में परिर्वतन नहीं आयेगा, जिससे वह समाज की मुख्यधारा से नहीं जुड़ पायेंगे। समाज की मुख्यधारा से नहीं जुड़ेंगे, तब तक उनका सामाजिक, राजनीतिक या आर्थिक विकास भी संभव नहीं है। मुसलमानों को यह बात समझनी ही होगी कि कोई भी राजनीतिक दल या सरकार उनका सामाजिक स्तर रातों-रात नहीं सुधार सकता। उसके लिए उन्हें स्वयं ही प्रयास करने होंगे और सबसे पहले सोच बदलनी होगी, जो खुल कर दिखनी भी चाहिए, मतलब पूरे समाज का विश्वास हासिल करना होगा। विश्वास बढऩे से उनके प्रति गैर मुसलमानों का प्रेम भाव जागृत होगा। एक-दूसरे के प्रति विश्वास और प्रेम न होने का ही दुष्परिणाम है कि राजनीतिक दल उन्हें छलते आ रहे हैं।
मुसलमानों को यह बात अब समझनी ही होगी कि भारत और पाकिस्तान के बीच जब भी क्रिकेट खेली जाती है, तब देश का माहौल गरम क्यूं हो जाता है?, साथ ही सानिया मिर्जा जब देश का नाम रोशन करती है, तो मुस्लिम धर्म गुरुओं को उसकी टी-शर्त नजर आती है, जबकि करोड़ों गैर मुसलमान उसका हौसला बढ़ा रहे होते हैं। शाखरुख खान, सलमान खान, आमिर खान या किसी भी मुसलमान अभिनेता-अभिनेत्री की फिल्में देखने गैर मुसलमान न जायें, तो फिल्म की दस प्रति लागात भी निर्माता को वापस नहीं मिलेगी। इसका अर्थ यही है कि गैर मुसलमानों को यह विश्वास हो जाये कि यह मुसलमान देश भक्त है, तो वह उसे प्यार और सम्मान देने में कमी नहीं करते। पूर्व राष्ट्रपति डा. एपीजे अब्दुल कलाम का नाम सुनते ही किसी भी गैर मुसलमान की छाती चौड़ी हो जाती है। इन छोटी-छोटी बातों के पीछे बड़ी ही गहराई से विचार करने की आवश्यकता है और जब तक विचार कर क्रियान्वयन नहीं किया जायेगा, तब तक मुसलमानों और गैर मुसलमानों के बीच खाई पटने की बजाये और अधिक गहरी ही होती जायेगी, जिसका लाभ राजनीतिक दल या तथा-कथित मुसलमान नेता ही उठाते रहेंगे और मुसलमानों की जिंदगी भाग्य के भरोसे ही गुजरती रहेगी, इसलिए देश और समाज के हित में आम मुसलमान ही निकल कर सामने आयें, क्योंकि गैर मुसलमान के बोलने से आम मुसलमान को विश्वास नहीं होगा, साथ ही जरूरी बात को भी राजनीति और धर्म से जोड़ कर राजनेताओं और स्वार्थी धार्मिक नेताओं द्वारा विवादित कर दिया जाता है, इसलिए आशा की जा सकती है कि आने वाली पीढिय़ों के हित के लिए आम मुसलमान अब चुप नहीं बैठेंगे।