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Thursday, 3 November 2011

गरीबी की इतनी बड़ी सज़ा होनी चाहिए क्या?

सरकार, राजनेता और समाज सुधारक आये दिन आम आदमी को नये-नये सपने दिखाते ही रहते हैं, लेकीन 21वीं सदी का एक दशक पार करने के बाद भी बहुत कुछ बदला नजर नहीं आ रहा है। यह तो साफ हो ही चुका है कि अब समृद्ध मानव होना ही सर्वश्रेष्ठ है और अगर कोई गरीब है, तो फिर वह धरती पर अभिशाप ही है। कर्ज में डूबे किसानों द्वारा की जा रहीं आत्म हत्याओं की घटनायें दिल दहला ही देती हैं, पर उनकी जान बचाने के लिए उचित कदम कब उठाये जायेंगे? इस सवाल का जवाब अभी तक किसी के पास नहीं हैं।
इसी तरह देश में बढ़ते लिंग अनुपात के कारण महिलाओं की स्थिति सुधरने की बजाये और दयनीय होती जा रही है। देश के मैट्रो शहरों के साथ उत्तर प्रदेश ऐसी मंडी बनता जा रहा है, जहां अन्य राज्यों से झांसा देकर लड़कियां लाई जा रही हैं और जानवरों की तरह उन्हें कई-कई जगह बेचा जा रहा है। बंधुआ मजदूर की तरह रखा जा रहा है या फिर बच्चे पैदा करने की मशीन भर रह गयी हैं। उत्तर प्रदेश में ऐसी महिलाओं की संख्या हजारों में हैं, जो बाहर के राज्यों से लाकर यहां बेची गयी हैं और फिर पसंद न आने पर पत्नी के रूप में रखने वाले पति ने दूसरे को और दूसरे ने तीसरे व्यक्ति को बेच दिया है, साथ ही सभी के घर वह एक-एक, दो-दो पैदा कर बच्चे भी छोड़ आई हैं। इससे उन लोगों का तो वंश चलने लगा है, पर ऐसी महिलायें या तो वैश्या बन कर रह गयी हैं या फिर मानसिक संतुलन खोने के कारण सडक़ों पर ठोकरें खाते हुए देखी जा सकती हैं। इससे भी बड़ी दरिंदगी की बात यह है कि ऐसी अर्द्ध विक्षिप्त महिलाओं को भी बहशी नहीं छोड़ते और उन्हें गर्भवती बना देते हैं। 21वीं सदी के भारत का एक कड़वा सच यह भी है, पर इस ओर किसी का ध्यान नहीं है, क्योंकि ऐसे मुद्दों को उठाने पर भीड़ नहीं जुटेगी, लोग चंदा भी नहीं देंगे और जब कोई चंदा नहीं देगा, तो फिर मुद्दे को कोई उठायेगा ही क्यूं?
उत्तर प्रदेश के पिछड़े जिलों के अधिकांश गांवों में दो-दो, चार-चार से लेकर दस-बीस से भी अधिक ऐसी महिलायें मिल जायेंगी, जिन्हें किसी तरह झांसा देकर बिहार, छत्तीसगढ़, असम आदि राज्यों से लाया गया है। दस, पन्द्रह गांवों के बीच एक दलाल भी ऐसा मिल जायेगा, जो पन्द्रह से पच्चीस हजार रुपये लेकर लडक़ी लाकर दे देता है या साथ जाने पर दिला देता है, क्योंकि गरीबी के चलते लड़कियों के माता-पिता अधिक पूछताछ नहीं करते और स्थानीय दलाल भी साथ रहता है, जिससे दो-चार हजार रुपये लेकर लडक़ी की शादी आसानी से कर छुटकारा पाने का प्रयास करते हैं, लेकिन उन्हें नहीं पता कि उनकी लड़कियों के साथ यहां क्या हो रहा है, क्योंकि वहां से आने के बाद लडक़ी फिर वापस नहीं जाती और न ही कोई उन्हें देखने आता है। 
इस तरह से झांसा देकर लाई गयी लड़कियों का पहले तो दलाल ही शारीरिक शोषण करता है और बाद में खान-पान, रहन-सहन और भाषा-व्यवहार में असमानता होने के कारण संबंधित पति बच्चे पैदा कर दलाल के ही माध्यम से अगली जगह बिकवा देता है और कई बार दूसरा भी वैसा ही करता है। इसके अलावा किसी परिवार में तीन, चार या पांच अविवाहित पुरुष हैं, तो उस महिला को अघोषित तौर पर सभी की पत्नी बन कर रहना पड़ता है। महिलाओं के साथ दंरिदगी का यह खेल दशकों से ही नहीं, बल्कि सदियों से चल रहा है, पर स्थानीय प्रशासन जानकारी होने के बाद भी कार्रवाई नहीं करता और देश के भाग्य विधाताओं की नज़र में यह कोई समस्या नहीं हैं, साथ ही पढ़ी-लिखी और धनाढ्य परिवारों की महिलाओं को जागरुक करने के लिए व पुरुष प्रधान समाज से मुकाबला करने के लिए देश में तमाम क्लब बने हुए हैं, आयोग है, संगठन हैं, एनजीओ हैं, लेकिन इन पीड़ीत महिलाओं को न्याय दिलाने वाला कोई नहीं है, क्योंकि यह गरीब के घर में पैदा हुई हैं, पर सवाल यह उठता है कि गरीबी की सजा इतनी बड़ी होनी चाहिए क्या?