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Sunday, 6 November 2011

भारतीयों की सोच में ही आ गयी है विकृति

भारतीय होने पर सभी गर्व की अनुभूति करते हैं, पर भारत के पास भी मानव शरीर की तरह ही अनुभूति करने की क्षमता होती, तो निश्चित ही आज के भारतीयों पर लज्जा महसूस कर रहा होता, क्योंकि अशिक्षित वर्ग की तो बात की छोडिय़े उच्च शिक्षा प्राप्त अधिकांश लोग सडक़ पर चलने तक के नियम का पालन करते दिखाई नहीं देते, जबकि बात आलोचना करने की आये, तो सिपाही से लेकर प्रधानमंत्री तक को एक सांस में कई-कई बार भला-बुरा कहते देखे जा सकते हैं। लोग पूरे तंत्र पर ही सवाल खड़ा करते देखे जा सकते हैं, लेकिन स्वयं घर के दरबाजे पर रखे कूढ़ेदान तक का प्रयोग नहीं करते। बस, ट्रेन से लेकर हर सार्वजनिक स्थल की देखरेख करने का दायित्व सरकार का ही समझते हैं और कुछ भी गलत दिखाई देने पर कोसने से बाज नहीं आते। इससे साफ है कि जिस देश में ऐसे लोगों की संख्या अधिक है, वो देश किसी भी क्षेत्र में किसी भी तरह का अपेक्षा के अनुरूप विकास कैसे कर सकता है?
भारतीयों में सबसे बड़ा अवगुण यही है कि पक्के अनुशासनहीन या लापरवाह होने के बावजूद स्वयं को अनुशासित और कर्मठ दर्शाते हैं, पर अनुशासन या कर्मठता व्यवहार में कहीं नहीं दिखते। नकलची कहने पर सबको बुरा लगता है, जबकि अवगुणों को आत्मसात करने में नंबर वन हैं। पश्चिम के किसी भी फैशन का असर भारत में बड़ी तेजी से होता देखा जा सकता है, पर पश्चिम के लोगों के गुणों को आज तक अपनाने का प्रयास तक नहीं किया गया है, तभी पश्चिमी देश लगातार आगे बढ़ रहे हैं और भारत समय के अनुसार बहुत पीछे नजर आ रहा है, जबकि नकल से भी आगे बढ़ा जा सकता है, इसका सबसे बड़ा उदाहरण चीन ही कहा जा सकता है। चीन के पास अधिकांश तकनीकी जानकारियां अन्य देशों की चुराई हुई हैं, जिनके बल पर वह अमेरिका तक को चुनौती देता रहता है। आम लोगों के साथ या सामान्य दिनों की बात छोड़ कर देखा जाये, तो भी संकट तक के क्षणों में भारत के लोग, राजनेता या अधिकारी संकट से उबरने या निपटने की बजाये संकट को और बढ़ाते ही नजर आते हैं। भारत में आई सुनामी भारत के मीडिया के लिए आज भी खबरें बेचने का माध्यम भर ही है, जबकि जापानी मीडिया ने सुनामी के समय भी संयमित खबरें ही जारी की और लोगों में भ्रम की स्थिति पैदा नहीं होने दी। एक-दूसरे की टांग खिंचाई करने की बजाये जापान के पक्ष व विपक्ष ने मिल कर जनहित के लिए मिल कर कार्य किया। पीडि़तों को जारी आर्थिक सहायता का दुरुपयोग करने की बजाये, वहां के अफसरों ने स्वयं के वेतन व जमापूंजी से भी लोगों की मदद की। अधिकांश परिवारों के सदस्य सुनामी में मारे गये थे, लेकिन एक भी व्यक्ति विचलित नहीं हुआ और दु:ख को अंदर समाहित कर बचे हुये लोगों की मदद में ही लगे रहे। इतना बड़ा संकट होने के बाद भी खाने-पीने की वस्तुओं की किल्लत नहीं आई, क्योंकि लोगों ने जरूरत से अधिक कुछ भी नहीं लिया, जबकि भारत में ऐसे संकट के समय भी कालाबाजारी होती रही है या प्रतिष्ठान लूटे जाते रहे हैं। पीडि़तों ने धैर्य पूर्वक पंक्तिबद्ध रह कर सहायता प्राप्त की, जबकि भारत में सहायता राशि बांटने वालों के पसीने छूट जाते हैं। इसी तरह सरकार ने पहले से ही अपने नागरिकों को भूकंप और सुनामी से संबंधित जानकारी व आवश्यक प्रशिक्षित दे रखा था, जो संकट के समय बेहद काम आया, वरना और भी परेशानियां हो सकती थीं, लेकिन भारत में ऐसे कार्य कागजों में अच्छी तरह कर लिये जाते हैं और आम आदमी को पता तक नहीं चलता।
जापान के अलावा दक्षिण कोरिया या उत्तर कोरिया की बात की जाये, तो यह देश भी हमेशा चर्चा का विषय इसी लिए बने रहते हैं कि यहां के नागरिक देश प्रति अपना प्रथम दायित्व निर्वहन करने के लिए आतुर रहते हैं। अपने मूल कार्य के अलावा प्रतिदिन देश के लिए कुछ घंटे अलग से कुछ करते हैं, तभी यह देश किसी भी देश को चुनौती देते समय डरते नहीं हैं, पर भारत में अभी तक ऐसा कहीं देखने को नहीं मिलता। सब कुछ विपरीत होता नजर आता है। आम आदमी की तो बात ही छोडिय़े वेतनभोगी कर्मचारी भी यहां कर्तव्य का निर्वहन करते नहीं दिखते। पूरा-पूरा दिन क्रिकेट मैच देख कर गुजारते देखे जा सकते हैं और कोई उन्हें टोकता तक नहीं। यह सब आम आदमी की अनदेखी के चलते हो रहा है। आम आदमी के जागरुक होते ही सब कुछ स्वत: ही सही नजर आने लगेगा। देश अपेक्षा से अधिक विकास करता हुआ स्पष्ट दिखने लगेगा। नागरिक आदर्श होंगे, तो तरक्की सिद्ध करने के लिए फिर किसी तरह के आंकड़ेबाजी की आवश्यकता नहीं पड़ेगी, पर दु:ख की बात यह है कि अनुशासनहीनता, लापरवाही व भ्रष्टाचार यहां के लोगों के खून में बसते नजर आ रहे हैं, क्योंकि अशिक्षित वर्ग की जगह शिक्षित वर्ग यह सब अधिक करता दिख रहा है। युवाओं से राजनीति के साफ करने की आशा की जा रही थी, पर सबसे कम उम्र का मुख्यमंत्री होने का रिकार्ड बनाने वाले झारखंड के मुख्यमंत्री मधू कोढ़ा या केन्द्रीय मंत्री ए. राजा ने घोटालों का भी रिकार्ड बना दिया है। कुछ लोग दलील देते हैं कि सेना के हाथ में सत्ता सौंप दी जाये, तो देश के हालात सुधर सकते हैं, पर सेना के ही अधिकारी सुरेश कलमाड़ी ने और दो कदम आगे बढ़ कर सिद्ध कर दिया कि सेना भी देश का कुछ भला नहीं कर सकती। आदर्श घोटाला या सुकना जमीन घोटाला भी उदाहरण के तौर पर देखे जा सकते हैं। कुछ लोग महिलाओं से बेहतर शासन की अपेक्षा करते हैं, पर भ्रष्टाचार या लापरवाही की सूची में महिलाओं के नाम भी कम नहीं हैं। कुल मिला कर भारत के लोगों की सोच में ही विकृति आ गयी है, इसलिए आम आदमी की सोच से इस विकृति का दूर होना आवश्यक है, क्योंकि जिस दिन यह विकृति दूर हो जायेगी, उसी दिन भारत फिर सोने की चिडिय़ा बनने की ओर अग्रसर हो जायेगा, पर सोच बदलने के लिए परंपरागत व अध्यात्मिक दिनचर्या की ओर लौटना होगा, लेकिन सबसे बड़े दु:ख की बात यह है कि ऐसी बातें करने वालों को आज का हाई-प्रोफाइल तबका दकियानूसी विचारधारा का पक्षधर करार देते हुए मूर्ख घोषित कर देता है।