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Sunday, 20 November 2011

हास्यास्पद है मायावती की पुन: वोट पाने की अपेक्षा

उत्तर प्रदेश और उत्तर प्रदेश की जनता को कुछ चहेते आईएएस व आईपीएस अधिकारियों के हवाले कर पुन: सत्ता में लौटने का मायावती का सपना पूरा होता नहीं दिख रहा। अधिकारियों की मनमानी और विधायकों के चारित्रिक पतन के कारण समाज का हर वर्ग बसपा शासन से व्यथित नजर आ रहा है, साथ ही बसपा सरकार से निजात पाने के अवसर का इंतजार करता दिख रहा है, लेकिन जनता से दूरी बना कर रहने वाली बसपा सुप्रीमो व मुख्यमंत्री मायावती को जन भावनाओं का अहसास तक नहीं है, क्योंकि स्वयं की आंखों से देख कर व अपनी समझ से शासन करने की बजाये, वह चहेते अधिकारियों के माध्यम से शासन करती नजर आ रही हैं। हालांकि उन्होंने जनहित को ध्यान में रख कर कई नीतियां व कई अच्छी योजनायें भी बनाई हैं, पर अधिकारियों की मनमानी और भ्रष्टाचार के चलते आम आदमी को अधिकांश योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाया, तभी प्रदेश के साथ आम आदमी के हालात और बद्तर होते जा रहे हैं।
उत्तर प्रदेश कभी देश का भविष्य तय करता था, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में ऐसा राजनीतिक वातावरण बना है कि उत्तर प्रदेश की अहमियत लगातार कम हुई है। गत विधान सभा चुनाव के बाद मायावती के नेतृत्व में बसपा को पूर्ण बहुमत मिलने से पुन: आशा जागृत हुई कि अब उत्तर प्रदेश का खोया हुआ गौरव वापस मिल जायेगा, लेकिन पूर्ण बहुमत के दंभ में मुख्यमंत्री मायावती समुद्र रूपी सत्ता की गहराईयों में मगरमच्छ की भांति जाकर सो गयीं और प्रदेश व प्रदेश की जनता को अपने चहेते अफसरों के हवाले छोड़ दिया, जो जनहित को नजर अंदाज कर स्वहित की योजनाओं को प्राथमिकता देने में ही लगे रहे। विकास कार्यक्रमों की बात की जाये, तो प्रदेश के इतिहास में पहली बार छोटी से छोटी वस्तु की खरीद-फरोख्त प्रदेश स्तर पर ही की जाती रही है। कमीशनखोरी के खेल के चलते मानकों को ताक पर रख कर गुणवत्ता को दरकिनार किया जाता रहा है, जिससे अधिकांश योजनाओं का परिणाम नकारात्मक ही आया है। पुलिस विभाग की बात करें, तो प्रदेश के इतिहास में पुलिस इतनी शक्तिशाली कभी नहीं रही है। थानाध्यक्षों के पद गोपनीय टेंडर व्यवस्था के तहत बांटे गये हैं और लगातार बांटे जा रहे हैं, जिसका दुष्परिणाम यह है कि थानाध्यक्ष मनमानी करते हुए जनता को लूटते नजर आ रहे हैं, तभी आम आदमी ने थाने जाना बंद कर दिया है या फिर पीडि़त व्यक्ति थाने जाने से पहले सत्ताधारी नेता के दरबार में चरण वंदना कर किसी तरह अपना काम चला रहा है। बात विधायकों की जाये, तो विधायकों ने भी देश में रिकार्ड कायम किया है। विधायकों के चारित्रिक पतन के इतने मामले आज तक किसी अन्य राज्य में प्रकाश में नहीं आये हैं। चारित्रिक पतन के साथ, खुलेआम गुंडागंर्दी व मारपीट की घटनाओं को अंजाम देने वाले अधिकांश विधायक बसपा के ही प्रकाश में आये हैं, साथ ही देश के इतिहास में पहली बार विकास कार्यक्रमों के लिए दी जाने वाली विधायक निधि का इतने बड़े पैमाने पर बंदरबांट किया गया है। सूत्र बताते हैं कि विधायकों ने चहेते ठेकेदारों या अपने परिजनों से ही कार्य कराये हैं, उसमें भी अपना सत्तर प्रतिशत हिस्सा नकद लेते रहे हैं। शेष बचे तीस प्रतिशत रुपये में से ठेकेदारों ने अपना व अधिकारियों का हिस्सा निकाल कर किसी तरह मौके पर खानापूर्ति ही की है। भ्रष्टाचार के चलते काम मौके पर कम कागजों में ही अधिक नजर आ रहे हैं।
इसके अलावा प्रदेश के विकास का हवाला देते हुए विभिन्न एक्सप्रेस-वे बनाने के मायावती के दावे का खुलासा हो ही गया है। जमीन हथियाने को लेकर किसानों पर किये गये अत्याचार से साफ हो ही गया है कि मायावती की योजना प्रदेश के विकास से अधिक स्वयं के विकास की ही अधिक रही है, वरना वह शराब माफियाओं के दबाव में खुलेआम प्रदेश में दो तरह की नीतियां नहीं बनातीं। उनकी गलत  नीतियों के चलते शराब माफिया प्रदेश की जनता को लूटते नजर आ रहे हैं। 
आम आदमी के अलावा विशिष्ट वर्ग की बात की जाये, तो बुद्धिजीवी या सम्मानित वर्ग को भी बसपा शासन में पूरी तरह नजर अंदाज ही नहीं किया गया है, बल्कि अपमानित भी किया गया है। आम आदमी की आवाज बुलंद करने वाले पत्रकारों को भी राजधानी में ही दौड़ा-दौड़ा कर और घर में घुस कर पीटा गया है और मायावती नीरो की भांति चैन की बंसी बजाती नजर आ रही हैं।
दूसरी ओर फसल का सही मूल्य लेने के लिए तरसते किसान महंगाई, बिजली, दवा, पानी, बीज, रोजगार, शिक्षा और सुरक्षा जैसी समस्याओं से भी जूझ रहे हैं, जिससे निजात दिलाने पर खर्च करने की बजाये मुख्यमंत्री मायावती ने पार्कों व पत्थर की मूर्तियों पर बेरहमी से रुपया खर्च कर दिया। लगभग पन्द्रह सौ व्यक्तियों पर एक सिपाही का औसत आता है, पर प्रदेश की जनता के मुकाबले मायावती को पार्कों व मूर्तियों की सुरक्षा की चिंता अधिक नजर आई, तभी अलग से फोर्स बनाया गया। दलितों की हिमायती होने का राग अलापने वाली मायावती को पूरे शासनकाल में एक बार भी यह ध्यान नहीं आया कि उनके अपने व दलितों के जीवन में स्तर में क्या अंतर है?
बसपा शासन काल में अगर किसी के जीवन स्तर में सुधार आया है, तो सबसे ऊपर उनका अपना नंबर है या फिर उनके अपने चहेते अफसर और विधायक हैं, जिन्होंने अपनी कई पीढिय़ों तक का इंतजाम कर लिया है, ऐसे में मायावती की प्रदेश की जनता से पुन: वोट पाने की अपेक्षा हास्यासपद ही नजर आ रही है।